बचपन में हम ओरण-गोचर भूमि को जंगल समझ कर खेलने जाने की जिद करते थे। तब बड़े बुजुर्ग कहते थे- वहां मत जाना, एक डाली भी मत तोड़ना, पाप लगेगा। डराते थे कि हाथ कट जाएगा। वो देवताओं की भूमि है। वहां से पत्ता भी मत लेकर आना। जैसलमेर में ओरण-गोचर भूमि के लिए प्रदर्शन कर रहे 34 साल के दुर्ग सिंह कहते हैं- आज हमें भगवान की जमीन के लिए लड़ना पड़ रहा है। 8 साल हो गए लेकिन, कोई अधिकारी सुनने को तैयार नहीं है। पहले जहां सिर्फ मवेशियों-पशु पक्षियों को जाने की इजाजत थी वहां अब अवैध खनन हो रहे हैं, सोलर-विंड कंपनियां आ रहीं हैं। वहीं, सुमेर सिंह कहते हैं- हमने कभी सोचा नहीं था कि भगवान की भूमि (ओरण) पर भी कभी भविष्य में कब्जा होगा। इसलिए किसी ने इसे रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करवाया। दैनिक भास्कर में पढ़िए जैसलमेर की करीब 25 लाख बीघा ओरण-गोचर भूमि का विवाद सवाल: क्यों हो रहा प्रदर्शन? जमीन भगवान और मवेशियों के लिए छोड़ी पर्यावरण प्रेमी और ओरण-गोचर भूमि के लिए आंदोलन कर रहे सुमेर सिंह बताते हैं- ये लड़ाई 8 साल से चल रही है। ओरण वो आस्था के केन्द्र हैं। जहां लकड़ी काटना, शिकार करना व किसी भी तरह की जमीन को कब्जा करना, खेती करना बैन था। जिस गांव के पास ओरण-गोचर भूमि होती वहां के ग्रामीण ऐसा करने की सोचते भी नहीं थे। ये जमीन भगवान और मवेशियों के लिए छोड़ी गई थी। ओरण के नाम भी देवी देवताओं के नाम से रखे गए थे। ताकि कोई भी उस जमीन के साथ छेड़छाड़ नहीं करें। यही वजह है कि आज भी ओरण की जमीनों पर हजारों की संख्या राज्य वृक्ष, पशु पक्षियों के लिए तालाब और मंदिर मौजूद हैं। पिछले 20 सालों से माफिया का ओरण-गोचर भूमि पर कब्जा बढ़ा है। यदि कहीं सरकार ने उसे अधिग्रहण किया है तो सोलर कंपनियों और अन्य को खुली छूट दी है। वे लगातार यहां पेड़ों को काटकर अपने फैक्ट्रियां लगा रहे हैं। इसीलिए हमें इस आंदोलन को तेज करना पड़ा। सुमेर सिंह बताते हैं- 16 सितंबर से करीब 400 गांवों से लोग कलेक्ट्रेट के सामने अलग-अलग बैठने आ रहे हैं और पर्यावरण प्रेमियों को समर्थन दे रहे हैं। इनकी एक ही मांग है- ओरण भूमि को ओरण के नाम से ही रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। 26 सितंबर को जन आक्रोश रैली आयोजित की गई थी। इसमें शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी,ख्याला मठ के गुरु गोरख नाथ महाराज, पूर्व राजपरिवार के सदस्य चैतन्य राज सिंह समेत अन्य भाजपा के नेता पहुंचे थे। प्रशासन ने आश्वासन दिया लेकिन, कार्रवाई नहीं हुई तो ग्रामीण फिर से धरने पर बैठ गए। अब GFX में समझिए सरकारी जमीन के रूप में दर्ज हैं भूमि सुमेर सिंह कहते हैं- 1962 और 1965 में समरी सेटलमेंट हुआ था। कई जमीनें अलग-अलग नाम से दर्ज हुई थीं। जैसलमेर में सर्वाधिक जमीन सिवाय चक (सरकारी लैंड) ही दर्ज हुई। वर्तमान में हमारी टीम समरी सेटलमेंट के रिकार्ड खंगाल रही है। शुरुआत में यह सामने आया है कि कुछ ओरण 1962 व 1965 में रिकार्ड में दर्ज हुए थे। लेकिन 1971 में फिर से किसी त्रुटिवश वापस सरकारी जमीन के रूप में दर्ज हो गए। जिसमें बईया व पारेवर ओरण शामिल हैं। ऐसे में, रिकॉर्ड में सरकारी जमीन दर्ज होने के चलते सीधे ही कंपनियों को आवंटित हो रही हैं। सुमेर सिंह कहते हैं- पहले का सिस्टम ऐसा था कि हम खुद की जमीनों को भी अपने नाम दर्ज नहीं करवा सके थे। पहले ग्रामीणों में जमीनों को लेकर इतना सजग कोई था भी नहीं। लगभग हर इलाके में ओरण भूमि हुआ करती थी। ‘कभी सोचा नहीं था ओरण पर कब्जा हो जाएगा’ सुमेर सिंह कहते हैं- लोगों की ओरण के प्रति काफी श्रद्धा थी, उनके पशु उसी इलाके में रहते थे, वहां मंदिर भी थे। ऐसे में ओरण को दर्ज करवाने के बारे में किसी ने नहीं सोचा। विश्वास ऐसा था कि ओरण की जमीन तो ऐसी ही रहेगी, क्योंकि कई सालों से ओरण की जमीन से छेड़छाड़ नहीं हुई थी। तो किसी ने ये सोचा भी नहीं था कि ओरण-गोचर को लेकर बाद में कब्जा हो जाएगा। हमारी मांग है कि वर्तमान में यदि ओरण दर्ज नहीं हुए तो आगे की पीढ़ी को नुकसान होगा। विश्वास था ओरण पर कब्जा नहीं हो सकता दुर्ग सिंह कहते हैं- बुजुर्ग बताते हैं यहां के लोगों ने जमीनों को अपने नाम भी नहीं करवाया। ओरण के बारे में तो उनका विश्वास था कि उसे दर्ज किसलिए करवाएं? ओरण की जमीन के साथ तो कोई भी छेड़छाड़ नहीं करेगा। लेकिन, उन्हें क्या पता था कि आने वाले समय में सरकारें ओरण की जमीनों को भी कंपनियों को आवंटित करने पर आमादा हो जाएगी। 3 लाख भूमि ही ओरण-गोचर में रजिस्टर्ड सुमेरसिंह बताते हैं- अकेले जैसलमेर में करीब 25 लाख बीघा जमीन ओरण-गोचर की है, इसमें से सिर्फ 3 लाख भूमि ही ओरण-गोचर में रजिस्टर्ड है। हम लगातार 8 साल से इसके लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। करीब 46 हजार बीघा जमीन की फाइलें राज्य सरकार और प्रशासन के पास 2-3 साल से लम्बित पड़ी हैं। वे बताते हैं कि वैसे देखा जाए तो जैसलमेर में वर्तमान में 800 के करीब राजस्व गांव हैं। ऐसे में करीब 400 गांवों में उनकी अपनी ओरण की जमीन है। जिनमें आज भी पत्ता तोड़ना भी गुनाह माना जाता है। जैसलमेर की ओरणों का महत्व जैसलमेर की ओरण, जैसे देगराय, लाठी, धोलिया, खेतोलाई और चाचा, प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण विश्राम स्थल प्रदान करती हैं। यहां उपलब्ध जल स्रोत, जैसे तालाब और पोखर, पक्षियों को पानी पीने और आहार प्राप्त करने में सहायता करते हैं। इसके अलावा, यहां की वनस्पति और फसलें पक्षियों के लिए आहार का स्रोत प्रदान करती हैं। हालांकि, ओरण क्षेत्रों को विभिन्न खतरों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि ऊंची-तारों की चपेट में आना, जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियाँ। इन खतरों से निपटने के लिए संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि ओरण क्षेत्रों को संरक्षित किया जा सके और प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल प्रदान किया जा सके। यह क्षेत्र विशेष रूप से ‘Central Asian Flyway’ के तहत आने वाले पक्षियों के लिए एक प्रमुख विश्राम स्थल है, जहां वे अपने लंबी दूरी के प्रवास के दौरान विश्राम करते हैं और ऊर्जा संचित करते हैं। — ओरण को लेकर हुए आंदोलन से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… भाटी बोले-राजनीति होती रहेगी,100 बीघा जमीन है,कमा के खा-लूंगा:प्रतापपुरी ने कहा- मैं यहां माइक पकड़ने नहीं आया; ओरण बचाने के लिए जारी रहेगा धरना जैसलमेर में ओरण-गोचर बचाने को लेकर गड़ीसर से कलेक्ट्रेट तक विशाल जन आक्रोश रैली निकाली गई है। रैली कलेक्ट्रेट पर धरना स्थल पर पहुंचने के बाद जनसभा के रूप में तब्दील हो गई। (पढ़ें पूरी खबर)