आरएनटी मेडिकल कॉलेज का हार्ट हॉस्पिटल पिछले 22 साल से एकमात्र कैथलैब के भरोसे है। जब यहां हार्ट हॉस्पिटल की शुरुआत की गई थी, तब कैथलैब में एक दिन में महज दो से तीन प्रोसीजर होते थे। अब इनकी संख्या बढ़कर सात गुना यानी 20 तक पहुंच गई है। एक प्रोसीजर में 15 मिनट से लेकर 4 घंटे तक का समय लग जाता है। ऐसे में रोज 5 से 7 मरीज वेटिंग में रह जाते हैं, जिन्हें अगले दिन बुलाया जाता है। अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2022-23 में नई कैथलैब की घोषणा तो हुई थी। लेकिन, दो साल बीतने के बावजूद इसका काम शुरू नहीं हो पाया। हार्ट हॉस्पिटल के विभागाध्यक्ष व सीनियर प्रोफेसर डॉ. मुकेश शर्मा का कहना है कि जयपुर स्तर से कैथलैब का टेंडर तय हो चुका है। मशीनरी भी खरीदी जा रही है। जल्द ही इसकी शुरुआत हो जाएगी। इस काम के लिए डीएमएफटी फंड से बजट जारी किया जाएगा। रोज 400 से ज्यादा मरीज पहुंच रहे ओपीडी में
वर्ष 2002-03 में यह कैथलैब शुरू हुई थी, उस समय यहां प्रतिदिन ओपीडी 50 की थी और अब 400 की औसतन ओपीडी हो चुकी है। उस समय प्रतिदिन 2 से 3 प्रोसिजर होते थे, जबकि अब प्रोसिजर बढ़कर रोजाना के 20 हो चुके हैं। नई कैथलैब के लिए टेंडर हो चुके : विभागाध्यक्ष
नई कैथलैब के लिए टेंडर किए जा चुके हैं। मशीनों की खरीद के साथ अन्य काम भी जल्द पूरे किए जाएंगे। इसका फायदा मरीजों को मिलेगा। लंबे समय बाद प्रयास रंग लाए हैं। -डॉ. मुकेश शर्मा, विभागाध्यक्ष हार्ट हॉस्पिटल उदयपुर वाल्व और बच्चों के दिल में छेद के उपचार के लिए भी कैथलैब जरूरी, खर्च 6 करोड़ हार्ट अटैक में अहम हार्ट अटैक मरीज को गोल्डन आवर में एंजियोप्लास्टी और स्टेंट की जरूरत होती है। कैथलैब होने से इलाज में देरी नहीं होती और जान बच जाती है। एंजियोग्राफी के जरिए नसों में ब्लॉकेज, संकुचन या रुकावट को सही तरह देखा जा सकता है, जो सामान्य जांच से संभव नहीं। हय इजाज मिनिमली इनवेसिव होता है।